کتاب هزار لقمه
سید محمد فواد ابراهیمی, 17 مرداد 1399
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در جمعم و تنهايم، نشنود كس صدايم |
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عاشقم و شيدايم، شاهد من خدايم |
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گاهي روم به افلاك، به هرجا سركشانم |
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گاهي حيران و سرمست، له شده زير پايم |
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آگاهي چون فزون شد، ناكامي من بيشتر |
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در معني اين جهان، مانده و بي صدايم |
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هر چند راز هستي، بركس عيان نباشد |
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بهر شناخت معني، شاهين تيز پايم |
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منم فواد دوران، شاهكار آفرينش |
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براي ديد معشوق، همواره در جفايم |
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ديشب من و دل، باهم قراري داشتيم |
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نهال دوستي را، بهر عمري كاشتيم |
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آموزش زمن و، پرورش كار دل شد |
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بهر تربيتش، كورس رقابت گذاشتيم |
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ناگهان باد خزان، در كندن آن همزمان |
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صبح از آن بزم محبت، يك خيالي داشتيم |
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سید محمد فواد ابراهیمی, 17 مرداد 1399
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